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चुनाव 2024: बिहार के यह तीन दिग्गज अपने पैर में कुल्हाड़ी मारने की स्थिति में फंसे {29-03-2024}

चुनाव 2024: बिहार के यह तीन दिग्गज अपने पैर में कुल्हाड़ी मारने की स्थिति में फंसे

Lok Sabha ने बहुत कुछ खोया, लेकिन कुछ भी नहीं मिला: यह जल्दबाजी होगी, लेकिन अब सहनशील भी नहीं है क्योंकि राजनीतिक गलियारे में सवाल उठता है: क्या पशुपति कुमार पारस अपने घर जाएंगे? क्या मुकेश सहनी का राजनीतिक जीवन समाप्त हो गया है? क्या पप्पू यादव ने गलती की? इसमें उत्तर है..।

चुनाव 2024: बिहार के यह तीन दिग्गज अपने पैर में कुल्हाड़ी मारने की स्थिति में फंसे

18 मार्च को, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने बिहार की 40 लोकसभा सीटों को बाँट दिया। तत्कालीन केंद्रीय मंत्री पशुपति कुमार पारस ने पहले ही कहा कि परिवार छोड़ने या जिद छोड़ने की जरूरत नहीं है। उसी तरह, एनडीए ने विकासशील इंसान पार्टी के अध्यक्ष मुकेश सहनी को अभी से लेकर बिहार विधानसभा चुनाव तक की स्थिति का चित्रण कियाठीक उसी तरह, एनडीए ने विकासशील इंसान पार्टी के अध्यक्ष मुकेश सहनी को अभी से लेकर बिहार विधानसभा चुनाव तक का चित्र दिखाया।

पशुपति कुमार पारस अपनी जिद पर अड़े रहे और 18 मार्च को सीट बंटवारे से अपना नाम गायब होने पर अगले दिन एनडीए से केंद्रीय मंत्री पद छोड़ दिया। यदि वे पटना आते हैं तो लालू यादव को सम्मान मिलेगा। लेकिन पारस और सहनी दोनों को कुछ नहीं मिला। जन अधिकार पार्टी के सर्वेसर्वा राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव ने दिल्ली में कांग्रेस से अलग होने का निर्णय आज भी महागठबंधन की पार्टियों में सीटों का बंटवारा करता है। इनके बाद क्या होगा?

 क्या हुआ और इसके बाद क्या हुआ?

खोने वालों में पहला नंबर: पशुपति कुमार पारस

लगभग छह महीने पहले से ‘अमर उजाला’ को बार-बार बताया कि भारतीय जनता पार्टी अंततः चिराग पासवान को वरीयता देगी। पशुपति कुमार पारस ने सोचा था कि भाजपा ने दिवंगत रामविलास पासवान की पार्टी को विभाजित कर दिया था। वह तवज्जो को मजबूरी नहीं समझ सका। तब चिराग पासवान और बिहार में भाजपा की सहायता से सीएम बने नीतीश कुमार एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वी थे। पिछले कुछ महीनों से चिराग को मिल रही तवज्जो से पारस को सबक देना चाहिए था, लेकिन वह ऐसा नहीं किया।

चिराग को भाजपा की ओर से हाजीपुर सीट पर पारस को हरी झंडी दी गई थी, लेकिन वह ऐसा नहीं किया। नतीजतन, पारस ने सीट बंटवारे में लोक जनशक्ति पार्टी के नाम की घोषणा के बाद भी नहीं समझा कि वह चाहे तो भतीजे चिराग पासवान के साथ बैठकर चर्चा कर सकता है। नतीजतन, लोजपा (रामविलास) के नाम पर निर्वाचित पांचों सीटें लोजपा (राष्ट्रीय) में स्थानांतरित हो गईं और पशुपति कुमार पारस को लोजपा (राष्ट्रीय) में स्थानांतरित कर दिया गया। वह किनारे होने के बाद भी केंद्रीय मंत्री पद से इस्तीफा नहीं देती और भाजपा के साथ बने रहती तो कुल्हाड़ी भी नहीं काटती। लेकिन उन्होंने अपने आप को कुल्हाड़ी मार दी।

अब आप कर सकते हैं

1. विकल्प अबतक, चिराग पासवान ने सिर्फ दो सीटों पर प्रत्याशी घोषित किए हैं,पशुपति कुमार पारस ने भाभी रीना पासवान से सीधे संपर्क करके भतीजे चिराग पासवान से एनडीए में अपनी जगह मांगी। 2। कांग्रेस की अंदरूनी उठापटक से किसी को एक सीट मिली तो उसे मांग सकते हैं। कांग्रेस उन्हें समस्तीपुर से अवसर दे सकती है। 2। राजद ने खगड़िया में अभी कोई प्रत्याशी नहीं भेजा है, इसलिए वह अपने मूल जिले में राजद के पास जा सकते हैं। 4। राजनीतिक अस्तित्व के लिए चिराग पासवान से हाजीपुर में चुनाव लड़ने के लिए अपनी पार्टी के और प्रत्याशी को एकजुट कर सकते हैं।

खोने वालों में संख्या दो: मुकेश सहनी

2020 में बिहार सरकार में विकासशील इंसान पार्टी के अध्यक्ष मुकेश सहनी को मंत्री पद दिया गया।भाजपा ने भी विधानसभा चुनाव में अपने प्रत्याशी उतारे थे, जो स्पष्ट रूप से एक बार फिर वापस आ सकते थे। ऐसा ही हुआ भी। उस समय सहनी विधान परिषद् के माध्यम से आए थे। वह सहनी आराम से रहते तो टिक सकता था, लेकिन कुछ परिस्थितियां उसे बाहर कर दीं। फिर उन्होंने बीजेपी छोड़ दी। सहनी ने लोकसभा चुनाव से पहले जब एनडीए और महागठबंधन में से कोई भी उन्हें महत्व नहीं दे रहा था, तब भी आगे नहीं बढ़े।

उन्हें यह नहीं समझा कि जातीय आधार पर हरी सहनी को भाजपा ने इतना बढ़ाया है और जदयू भी मदन सहनी को मंत्री पद दे रहा हैइसलिए, वह जातीय जनगणना में 2.60 प्रतिशत जनसंख्या के नाम पर अपने लिए महत्वपूर्ण निर्णय लेने की स्थिति में नहीं हैं। वह इस आधार पर डील चाहते थे और यह भी नहीं दिखाना चाहते थे कि उनकी कोई विशिष्ट इच्छा है। एनडीए ने इस मामले में भाग लिया। 2019 में उन्हें साथ रखने वाले महागठबंधन में भी इनके लिए स्थान नहीं था।

अब कर सकते हैं

1. विकल्प मधुबनी, खगड़िया और मुजफ्फरपुर में पिछली बार मुकेश सहनी की पार्टी ने प्रत्याशी उतारे थे। सहनी स्वयं खगड़िया से उतरे। कांग्रेस, खगड़िया सीपीएम और मधुबनी राजद इस बार मुजफ्फरपुर सीट पर हैं। राजद से ही कुछ मांग सकते हैं। 2. एनडीए में भाजपा या जदयू से बात कर अपनी जगह चाहें। 3. राजनीतिक कॅरियर को बचाने के लिए अपने प्रत्याशी को कुछ सीटों पर अलग से उतारें।

खोने वालों में नंबर 3 : पप्पू यादव

बिहार में पूर्व सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव ने जन अधिकार पार्टी की स्थापना की, जो लोगों की समस्याओं को लेकर एक आंदोलन था। पप्पू यादव ने इस प्रसिद्ध पार्टी को कांग्रेस में शामिल कर लिया और उसे विलय कर दिया।

वह इस विलय से पहले राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव से मुलाकात कर चुके थे। पार्टी छोड़ते समय पप्पू यादव ने सोचा कि कांग्रेस उन्हें पूर्णिया से प्रत्याशी बनाएगी। कांग्रेस की एक भी नहीं चली। पूर्णिया की सीट देने के लिए जदयू सरकार की पूर्व मंत्री बीमा भारती को राजद ने अपनी पार्टी की सदस्यता दी और सिंबल भी दिया। शुक्रवार को राजद के खाते में पूर्णिया सीट की औपचारिक घोषणा भी हुई। पप्पू यादव, हालांकि, यहां कांग्रेस का झंडा उठाने की मांग करते हैं।

क्या अब कर सकते हैं

विकल्प – 1। कांग्रेस ने पूर्णिया से पप्पू यादव को सिंबल नहीं दिया तो वह निर्दलीय हो सकते हैं। 2. पप्पू एनडीए-राजद के साथ नामांकन दाखिल कर सकते हैं अगर कांग्रेस सिंबल दे दे। 3. अपनी पार्टी को पुनर्गठित करने का औपचारिक ऐलान कर सकते हैं।

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