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भारत में समलैंगिक विवाह, सिविल यूनियन और संबंधित सिविल और धार्मिक कानूनों पर चर्चा

समलैंगिक विवाह को कानूनी मंजूरी देने के मामले में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि सरकार किसी भी व्यक्ति के साथ यौन संबंध के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकती है, जिस पर उस व्यक्ति का कोई नियंत्रण नहीं है। कोर्ट ने यह भी कहा कि केंद्र सरकार के पास इस दावे के समर्थन में कोई पात्र नहीं है कि समलैंगिक विवाह ‘अभिजात’ या ‘शहरी’ है।



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नई: दिल्ली में समलैंगिकों की शादी को लेकर सिविल यूनियन का मामला भी उठाया गया। सिविल यूनियन फाइनल क्या है। अलग-अलग पर्सनल लॉ क्या हैं और शादी से कितना अलग है सिविल यूनियन में इसे देखने की जरूरत है।

पर्सनल और सिविल लॉ में मामला


केंद्र सरकार ने कहा है कि अगर समलैंगिक विवाह को सहमति दे दी जाएगी तो फिर से गोद लेने से लेकर दूसरे सिविल लॉ पर असर होगा। निबंध नियमों में व्यापक बदलाव की चर्चा होगी।

भारत में गोद लेने का कानून, उत्तराधिकार से संबंधित कानून, तलाक के कानून सभी अलग-अलग हैं और यहां राष्ट्रमंडल सिविल कोड लागू नहीं होता है, ऐसे में सवाल यह है कि अगर समलैंगिक विवाद को मान्यता दी जाती है तो अन्य सिविल कानून जो अलग-अलग धर्म के हैं पर्सनल लॉ से गाइड होते हैं उनमें बदलाव की दरकार होगी।

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• मुस्लिम पर्सनल लॉ में चार रिवायत करने की छूट है लेकिन अन्य धर्मों में एक पति-पत्नी के नियम बहुत सारे मानक से लागू होते हैं। हिंदू, ईसाई, पारसी के लिए भी बांझपन या नपुंसकता होना दूसरा विवाह अपराध है। भारतीय दंड संहिता की धारा-494 में 7 वर्ष की सजा का प्रावधान है।


• विवाह की न्यूनतम आयु भी सार्वजानिक के लिए एक समान नहीं है। मुस्लिम लड़कियों की उम्र निर्धारित नहीं की जाती है और माहवारी पर लड़कियों को उपयुक्त मान लिया जाता है, इसलिए 11-12 साल की उम्र में भी लड़कियों को वैध माना जाता है। अन्य धर्मों में लड़कियों की शादी की न्यूनतम आयु 18 वर्ष और लड़कों की 21 वर्ष है।

हिंदू लॉ के तहत 15 साल से ऊपर की उम्र में शादी नहीं होती बल्कि शादी हो सकती है। अगर, लड़की नहीं है तो 18 साल की उम्र पार करने के बाद शादी को सामाजिक आधार पर रखा जा सकता है लेकिन ऐसा ही होता है।


तीन तलाक अवैध घोषित के बावजूद तलाक-ए-हसन और तलाक-ए-अहसन आज भी मान्य हैं और इनमें भी तलाक का आधार नहीं है और केवल 3 महीने का इंतजार करना है। अन्य धर्मों में केवल न्यायालय के माध्यम से ही विवाह-विच्छेद किया जा सकता है। हिंदू, ईसाई, पारसी संप्रदाय से साम्प्रदायिक विवाह नहीं तोड़ सकते।


• मुस्लिम कानून में उत्तराधिकार की व्यवस्था जटिल है। व्यावसायिक संपत्ति में बेटे-बेटियों के बीच भेदभाव है। अन्य धर्मों में भी विवाह के बाद संपत्ति में पत्नी के अधिकार वर्जित हैं और उत्तराधिकार के कानून बहुत जटिल हैं। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम और भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम में बेटी और बेटे को बराबर का हक है।


• तलाक की स्थिति में या पति और पत्नी के बीच विभेद की स्थिति में हिंदू लॉ में गुजराता भाईचारा पति की दोस्ती से तय होता है। मुस्लिम पर्नसल लॉ में तलाक के बाद मेहर की नक़ल दी जाती है।


• गोद लेने के नियम हिंदू, मुस्लिम, पारसी, ईसाई सभी के लिए अलग-अलग हैं। मुस्लिम भगवान नहीं ले सकते और अन्य धर्मों में भी पुरुष प्रधान के साथ भगवान की व्यवस्था लागू होती है।

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दुनिया में जहां समलैंगिक विवाह की इजाज़त नहीं वहां सिविल यूनियन

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दुनिया के कई देशों में सेम सेक्स मानकों को मान्यता मिली हुई है। कुछ देश ऐसे भी हैं, जहां यह अवैध है लेकिन एक समुद्र तट से बाहर चला गया है। फ्रांस और उत्तरी यूरोप में पारंपरिक विवाह के बजाय सिविल यूनियन वोग में है। जापान में समलैंगिक विवाह गैरकानूनी है लेकिन वहां सिविल यूनियन का सिद्धांत दिया गया है, जिसे पंजीकृत किया गया है।

यह धार्मिक रूप से लिया गया है- देना नहीं है और न ही यह पारंपरिक शादी है बल्कि साथ रहना की सहमति है। यह एक अलग कैटिगरी है। किसी का भी यौन रुझान हो और जेंडर हो उन्हें सिविल यूनियन के तहत मान्यता दी गई है। इसके अंतर्गत कपल को कई अधिकार और दायित्व दिए गए हैं। जैसे अस्पताल में बच्चों की झलक के समय का खुलासा किया जाता है। साथ ही दोनों की संपत्ति में बच्चे को अधिकार दिए गए हैं। बैंक खाता खोलने की सुविधा है।




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भारत में भी सिविल यूनियन पर अध्ययन की आवश्यकता है


अधिवक्ता एम. एस. खान कहते हैं कि भारत में लॉ बनाने वाले को यूनियन सिविल में नौकरी पर नियुक्त करने वालों से सलाह की जरूरत है। भारत में विशेष नियम अधिनियम है, जिसके तहत किसी भी धर्म के आचार्य से दूसरे धर्म के आचार्य से विवाह किया जा सकता है। सिविल यूनियन का सिद्धांत अलग है, क्योंकि यह शादी नहीं है।

भारत में लिव-इन अधिकार को सर्वोच्च न्यायालय समय-समय पर समझा जाता है और इसके तहत घरेलू हिंसा कानून के तहत स्नातक की उपाधि प्राप्त की जाती है। मगर, सिविल यूनियन को यदि सहमति दी गई है तो कपल के कई सिविल अधिकार उन्हें मिल जाएंगे। हालांकि भारत में कॉमनवेल्थ सिविल कोड लागू नहीं है ऐसे में सिविल लॉ में किस तरह से रिवाइवल इस पर एक व्यापक अध्ययन करना होगा।

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